रक्षाबंधन सिर्फ प्रेम का बंधन
वैदिक धर्म अनुसार "रक्षासूत्र (रक्षाबंधन)" इस पवित्र भावना के साथ बाँधा जाता है कि बंधवाने वाले व्यक्ति की ईश्वर रक्षा करें, विजय, शक्ति आदि उसे प्रदान करें। रक्षाबंधन कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को बाँध सकता है। इसकी प्रथम शुरुवात देवराज इंद्र की पत्नी शचि ने तपस्या से प्राप्त "रक्षासूत्र" अपने पति इंद्र की असुरों के रक्षा करने के लिए उनकी कलाई में श्रावण मास की पूर्णिमा को बाँधा था।
इसी प्रकार माता लक्ष्मी ने गरीब महिला का रूप धारण कर राजा बलि को श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा था। राजा बलि दानवीर थे तो उन्होंने रक्षासूत्र बांधने के उपलक्ष में गरीब महिला को कुछ माँगने को कहा और वचन दिया कि जो भी वह मांगेगी वह राजा बलि उन्हें देंगे तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि के द्वारपाल बने अपने पति श्री विष्णु को माँगा। दानवीर राजा बलि तब पहचान गए कि यह गरीब महिला नहीं वरन स्वयं माता लक्ष्मी हैं। राजा बलि ने श्री विष्णु को उनके दिए वचन से मुक्त कर माता लक्ष्मी की इच्छा पूरी की तथा माता लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई के रूप में स्वीकार किया।
माता लक्ष्मी व राजा बलि के इस वृत्तांत के बाद धीरे धीरे यह त्यौहार भाई-बहन के त्यौहार के तौर पर मनाया जाने लगा।
इसी प्रकार सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का गला काटने के बाद सुदर्शन चक्र से चोट लगने पर श्री कृष्ण की उंगली से खून बहने लगा यह द्रौपदी ने देखते ही अपना पल्लू फाड़कर श्री कृष्ण की चोट पर बाँध दिया, जिसे भी रक्षाबंधन के पर्व को मनाने का एक कारण माना जाता है। रानी द्रौपदी तो श्री कृष्ण के मित्र अर्जुन की पत्नी थीं, भुआ कुन्ती की बहू थीं उस लिहाज से रानी द्रौपदी और श्री कृष्ण में देवर/जेठ-भाभी का रिश्ता था।
वर्तमान काल में अन्य त्यौहारों की तरह ही अधिकांश रिश्तों में "रक्षाबंधन" दिखावा मात्र रह गया है इसमें जो असल भावनाएं थीं वह तो खत्म होती जा रही हैं या खत्म हो चुकी हैं। बहन एवं भाई में प्रेम ही नहीं बचा सिर्फ तृष्णा, घृणा, छल कपट, नफरत, लालच, भौतिकता आदि बुरी भावनाओं को दिल में रखकर, पवित्रता को छोड़कर सिर्फ रस्म निभाई जाने लगी है।
ऐसी भावना विहीन रस्म से अच्छा है कि जिसके हृदय में प्रेम एवं पवित्र भावनाएं नहीं है उसे न रक्षाबंधन करवाएं और न ही करें।
"रक्षाबंधन" पवित्र भावना के साथ स्वच्छ हृदय से बंधवाने वाले व्यक्ति और बांधने वाले व्यक्ति दोनों की रक्षा हेतू , शक्ति-स्वास्थ्य-विजय-यश आदि की कामना के साथ किसी को भी बाँधी या किसी से भी बँधवाई जा सकती है, सिर्फ बहन ही भाई को रक्षाबंधन कर सकती है यह सिर्फ एक भ्रांति मात्र है।
पति-पत्नि, पिता-पुत्र/पुत्री, माता- पुत्र/पुत्री, दोस्त-दोस्त, भाई - भाई, बहन-बहन, सास-बहू, देवर-भाभी, ननद-भाभी कोई भी रिश्ता हो किसी को भी "रक्षाबंधन" किया जा सकता है। यहाँ धागे-उपहार का महत्व नहीं है, यहाँ एक दुसरे के प्रति निश्छल प्रेम व भावनाओं का महत्व है।
महेश शर्मा जबलपुर
इसी प्रकार माता लक्ष्मी ने गरीब महिला का रूप धारण कर राजा बलि को श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा था। राजा बलि दानवीर थे तो उन्होंने रक्षासूत्र बांधने के उपलक्ष में गरीब महिला को कुछ माँगने को कहा और वचन दिया कि जो भी वह मांगेगी वह राजा बलि उन्हें देंगे तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि के द्वारपाल बने अपने पति श्री विष्णु को माँगा। दानवीर राजा बलि तब पहचान गए कि यह गरीब महिला नहीं वरन स्वयं माता लक्ष्मी हैं। राजा बलि ने श्री विष्णु को उनके दिए वचन से मुक्त कर माता लक्ष्मी की इच्छा पूरी की तथा माता लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई के रूप में स्वीकार किया।
माता लक्ष्मी व राजा बलि के इस वृत्तांत के बाद धीरे धीरे यह त्यौहार भाई-बहन के त्यौहार के तौर पर मनाया जाने लगा।
इसी प्रकार सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का गला काटने के बाद सुदर्शन चक्र से चोट लगने पर श्री कृष्ण की उंगली से खून बहने लगा यह द्रौपदी ने देखते ही अपना पल्लू फाड़कर श्री कृष्ण की चोट पर बाँध दिया, जिसे भी रक्षाबंधन के पर्व को मनाने का एक कारण माना जाता है। रानी द्रौपदी तो श्री कृष्ण के मित्र अर्जुन की पत्नी थीं, भुआ कुन्ती की बहू थीं उस लिहाज से रानी द्रौपदी और श्री कृष्ण में देवर/जेठ-भाभी का रिश्ता था।
वर्तमान काल में अन्य त्यौहारों की तरह ही अधिकांश रिश्तों में "रक्षाबंधन" दिखावा मात्र रह गया है इसमें जो असल भावनाएं थीं वह तो खत्म होती जा रही हैं या खत्म हो चुकी हैं। बहन एवं भाई में प्रेम ही नहीं बचा सिर्फ तृष्णा, घृणा, छल कपट, नफरत, लालच, भौतिकता आदि बुरी भावनाओं को दिल में रखकर, पवित्रता को छोड़कर सिर्फ रस्म निभाई जाने लगी है।
ऐसी भावना विहीन रस्म से अच्छा है कि जिसके हृदय में प्रेम एवं पवित्र भावनाएं नहीं है उसे न रक्षाबंधन करवाएं और न ही करें।
"रक्षाबंधन" पवित्र भावना के साथ स्वच्छ हृदय से बंधवाने वाले व्यक्ति और बांधने वाले व्यक्ति दोनों की रक्षा हेतू , शक्ति-स्वास्थ्य-विजय-यश आदि की कामना के साथ किसी को भी बाँधी या किसी से भी बँधवाई जा सकती है, सिर्फ बहन ही भाई को रक्षाबंधन कर सकती है यह सिर्फ एक भ्रांति मात्र है।
पति-पत्नि, पिता-पुत्र/पुत्री, माता- पुत्र/पुत्री, दोस्त-दोस्त, भाई - भाई, बहन-बहन, सास-बहू, देवर-भाभी, ननद-भाभी कोई भी रिश्ता हो किसी को भी "रक्षाबंधन" किया जा सकता है। यहाँ धागे-उपहार का महत्व नहीं है, यहाँ एक दुसरे के प्रति निश्छल प्रेम व भावनाओं का महत्व है।
महेश शर्मा जबलपुर

Comments
Post a Comment