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शानदार जीवन - मेरी नज़र से

  शानदार जीवन जीने का मतलब विलासिता पूर्ण, सभी सुविधाओं से युक्त, राजसी जीवन जीना कतई नहीं है। शानदार जीवन जीने का मतलब चिंतामुक्त होकर अपने और अपने परिवार को पर्याप्त समय देना, इतना कामना की परिवार की जरूरतें पूरी हो न कि धन कमाने में ही पूरा समय लगा देना, रोगमुक्त एवम बिंदास जीवन जीना है। किसी और के दबाव में आकर अपने जीवन में वो नहीं करना जो हमें पसंद नहीं है अर्थात अपना जीवन अपनी इच्छा, पसंद एवं सकारात्मक तरीके से जीना ही जीवन को आनंदित करता है। ऐसी जिंदगी जिसमें चिंता,भय, घबराहट एवं दूसरों के दबाव या हस्तक्षेप की कोई जगह ना हो, न ही हम किसी और के जीवन में हस्तक्षेप करें या दबाव बनाएं। वैसी जिंदगी, जो मानवता के कल्याण के लिए जिया जाए। इस दुनिया में काफी लोग आवश्यकता से ज्यादा सम्पन्न हैं मगर फिर भी और अधिक सम्पनता की चाह में चिंतित रहते हैं, अपने धन-संपत्ति-नाम-शिक्षा आदि के दिखावे के अहंकार में रहते हैं और विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाते है। मेरी नज़र में एक गरीब मज़दूर जो रोज़ अपने जीवन के हर पल का आनंद लेता है, वो उस अरबपति जो पूरे समय चिंतित, आक्रांत, बीमारियों से घिरा हुआ र...

भावनाओं में बदलाव वास्तविक आनंद से दूर हैं ।

 एक गांव में एक व्यापारी अपने परिवार के साथ आनंद से रहता था। एक दिन घर लौटते समय उसे रोड पर पड़ी रत्नजड़ित अंगूठी दिखी, उसने अंगूठी उठाई और मन में सोचा कि यह नकली है इसलिए रोड पर ऐसे पड़ी है। खैर वह उस अंगूठी को जेब में रखकर घर ले आया और अलमारी में रखकर भूल गया। 2 सालों बाद वह अंगूठी उसे अलमारी में रखी दिखी जब वह कुछ और ढूंढ़ रहा था तो वह अंगूठी लेकर सुनार के पास पता करने गया कि वह असली है या नकली। सुनार ने कसौटी पर जांचकर बताया कि अंगूठी असली सोने की है और उसकी कीमत रत्न के साथ लगभग 1 लाख रुपए होगी। यह सुनकर व्यापारी बहुत प्रसन्न हो गया, अभी तक जिसे नकली समझकर ऐसे ही अलमारी के कोने में रखा हुआ था उसे अच्छे से तिजोरी में रख दिया। अब उस व्यापारी का दिमाग सिर्फ उस अंगूठी में लग गया और व्यापार व परिवार से अब तक जो वो संतुष्ट था और आनंद से रहता था अब अंगूठी के उत्साह के साथ मन से बेचैन और असंतुष्ट रहने लगा। वह शहर के बड़े सुनार के पास गया। सुनार ने जाँच करके कहा कि यह बहुत कीमती है वह व्यापारी से बोला कि अगर वह बेचना चाहता है तो सुनार 10 लाख नगद में उससे खरीदने तैयार है। व्यापारी ने बेचने स...

रक्षाबंधन सिर्फ प्रेम का बंधन

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वैदिक धर्म अनुसार "रक्षासूत्र (रक्षाबंधन)" इस पवित्र भावना के साथ बाँधा जाता है कि बंधवाने वाले व्यक्ति की ईश्वर रक्षा करें, विजय, शक्ति आदि उसे प्रदान करें। रक्षाबंधन कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को बाँध सकता है। इसकी प्रथम शुरुवात देवराज इंद्र की पत्नी शचि ने तपस्या से प्राप्त "रक्षासूत्र" अपने पति इंद्र की असुरों के रक्षा करने के लिए उनकी कलाई में श्रावण मास की पूर्णिमा को बाँधा था। इसी प्रकार माता लक्ष्मी ने गरीब महिला का रूप धारण कर राजा बलि को श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा था। राजा बलि दानवीर थे तो उन्होंने रक्षासूत्र बांधने के उपलक्ष में गरीब महिला को कुछ माँगने को कहा और वचन दिया कि जो भी वह मांगेगी वह राजा बलि उन्हें देंगे तब माता लक्ष्मी ने राजा बलि के द्वारपाल बने अपने पति श्री विष्णु को माँगा। दानवीर राजा बलि तब पहचान गए कि यह गरीब महिला नहीं वरन स्वयं माता लक्ष्मी हैं। राजा बलि ने श्री विष्णु को उनके दिए वचन से मुक्त कर माता लक्ष्मी की इच्छा पूरी की तथा माता लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई के रूप में स्वीकार किया। माता लक्ष्मी ...